Monday, November 30, 2009

यदि आप व्यायाम करते हैं तो सावधान




अमेरिका में 45 से 55 वर्ष आयुवर्ग के 200 लोगों पर किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इस वर्ग के व्यायाम करने वाले लोगों में घुटनों की चोट की संभावना सर्वाधिक होती है. दूसरे शब्दों में, इसे गठिया बीमारी से जोड़ कर देखा जाता है.


अध्ययन में यह भी पाया गया कि cartilage (उपास्थि) व ligaments में दौड़ने व कूदने जैसे व्यायामों से चोट की संभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है जबकि, साइक्लिंग व तैराकी में यह संभावना कहीं कम होती है. इससे पुरुष व स्त्री समान रूप से प्रभावित होते हैं.


इस अवधारणा को भी ग़लत पाया गया है कि यदि जोड़ो में दर्द हो तो इस प्रकार के व्यायामों से आराम मिलता है जबकि सच्चाई यह है कि इस प्रकार के खेल चोट को और अधिक क्षति पहुँचाते हैं. भलाई इसमें है कि डॉक्टर की सलाह से उचित व्यायाम चुनें.
-काजल कुमार

Monday, October 19, 2009

ओह ! कहीं आप भी ये एंटी वायरस तो नहीं ले बैठे ?

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एंटी वायरस बनाने वाली कंपनी सीमेंटिक के हवाले से रायटर ने ख़बर दी है कि आजकल नक़ली एंटी वायरस का जाल बहुत तेज़ी से फैल रहा है. ख़बर के अनुसार लगभग ४.५ करोड़ कंप्यूटरों पर इस समय ऐसे प्रोग्राम लदे पड़े हैं.
 
इन प्रोग्रामों की खूबी ये है कि नेट-सर्फ़िंग के दौरान ये बस यूँ ही प्रकट होते हैं. स्क्रीन पर संदेश आता है कि आपका कंप्यूटर फ़लाँ-फ़लाँ वायरस से प्रभावित है, इसे दूर करने के लिए स्कैन कीजिए. इस वायरस क्लीनर का नाम और डिज़ाइन आपको सुने-देखे से लगेंगे और डाउनलोड का विकल्प भी मिलेगा. इसे दबाते ही आपको लगेगा कि सॉफ़्टवेयर बड़ी तेज़ी से डाउनलोड होकर इंस्टाल हो गया. फिर रिपोर्ट आएगी कि फ़लाँ-फ़लाँ वायरस क्लीन कर दिए गए हैं.
 
वास्तव में कंप्यूटर पर कोई वायरस था ही नहीं अलबत्ता, इस बीच एक स्पाइवेयर कंप्यूटर में बस ज़रूर गया. ऐसे कुछ प्रचलित वायरस हैं SpywareGuard2009, AntiVirus 2009, AntiVirus 2010, Spyware Secure,XP AntiVirus इत्यादि.
 
ये वायरस कंप्यूटर से डाटा तो उड़ा ही लेते हैं, कंप्यूटर का भट्ठा भी बैठा देते हैं. भलाई इसी में है कि मुफ़्त का लालच न किया जाए.

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.काजल कुमार

Sunday, October 18, 2009

OLED एक जादुई अविष्कार है.

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LED के बारे में तो आपने ज़रूर पढ़ा-सुना होगा. आइए आज आपको एक नई तकनीक OLED के बारे में बताएँ.
 

OLED का विचार तो यूँ आधी सदी से भी पुराना है किंतु इसका व्यवसायिक प्रयोग अब जाकर 2004 से होने लगा है क्योंकि इसे प्रखर होने में बहुत समय लग गया. इसकी विशेषता यह है कि इसे किसी भी सतह पर प्रयुक्त किया जा सकता है चाहे वह सपाट शीशा हो या लचीला प्लास्टिक. इसलिए कहा जा सकता है इसके प्रयोग की संभावनाएँ अपार हैं. दृश्य LED स्क्रीन के मुकाबले OLED स्क्रीन पर कहीं बेहतर दिखाई देते हैं.

 
OLED का पूरा नाम है organic light emitting diode. इस तकनीक के अंतर्गत किसी भी सतह पर एक जैवि क पदार्थ लगाया जाता है जिसमें विद्युत प्रवाहित करने से जैवि क पदार्थ चमकने लगता है. इसके अतिरिक्त PLED भी प्रयुक्त होने लगा है, जिसमें जैविक पदार्थ का स्थान पोलीमर (polymer) ने लिया है. OLED की संभावनाओं की एक बानगी यहां क्लिक करके देखें, आपको अपनी आंखों पर भरोसा नहीं होगा.
 
सैमसंग आज OLED का प्रयोग करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है. इसके अतिरिक्त सोनी, एल.जी. आदि दूसरी कंपनियाँ भी इसके प्रयोग में पीछे नहीं हैं. इस तकनीक का प्रयोग टी.वी. स्क्रीन, मोबाईल स्क्रीन, डिजिटल कैमरा स्क्रीन आदि में हो रहा है. ईस्टमैन कोडक व अन्य लोगों के पास इस तकनीक के प्रतिलिप्याधिकार हैं. आज सैमसंग, सोनी, एल.जी. के अतिरिक्त ड्यूपांट और जनरल इलेक्ट्रिक ग्लोबल रिसर्च जैसी दूसरी कंपनियाँ भी बड़े पैमाने पर ओलेड पैनेल बना रही हैं.

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-काजल कुमार

Saturday, October 3, 2009

ट्विट्टर के आजकल बुरे दिन चल रहे हैं

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जिस ट्विट्टर ने आते ही सबका दिल जीत लिया, आजकल बुरे समय से गुज़र रहा है. बहुत से virus और malware बनाने वालों ने बड़ा सीधा नुस्ख़ा अपनाया है. ये लोग किसी नक़ली ID में ठीक दूसरे ट्विट्टर सदस्यों की ही तरह दिखाई देते हैं.
 
जब भी कोई, ऐसी किसी भी ID के URL को क्लिक करता है तो वह धर लिया जाता है. या तो उसका कंप्यूटर वायरस/ malware से पटने लगता है उसकी ID से ऐसे संदेश ट्विट्टर पर जाने लगते हैं जिनसे उसका कोई वास्ता नहीं होता.
 

नॉरटन एंटी वायरस बनाने वाली कंपनी सीमेंटिक के अनुसार फायरफॉक्स और एक्सप्लोरर दोनों ही, सुरक्षात्मक प्लग-इन उपलब्ध करवा रहे हैं लेकिन इनकी सीमा ये है कि ये केवल क्लिक किए जाने वाले URL का पूरा पता दिखाते हैं पर, इस बात का निश्चय करना उपभोक्ता पर निर्भर करता है कि वह उसे समझ कर क्लिक करे या न करे.

 
इसलिए ट्विट्टर सदस्यों की भलाई इसी में है कि वे ट्विट्टर पर किसी भी URL को क्लिक करने से पहले सुनिश्चित कर लें कि कहीं वे कोई ख़तरा तो मोल लेने नहीं जा रहे!

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-काजल कुमार

ट्विट्टर के आजकल बुरे दिन चल रहे हैं

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जिस ट्विट्टर ने आते ही सबका दिल जीत लिया, आजकल बुरे समय से गुज़र रहा है. बहुत से virus और malware बनाने वालों ने बड़ा सीधा नुस्ख़ा अपनाया है. ये लोग किसी नक़ली ID में ठीक दूसरे ट्विट्टर सदस्यों की ही तरह दिखाई देते हैं.
 
जब भी कोई, ऐसी किसी भी ID के URL को क्लिक करता है तो वह धर लिया जाता है. या तो उसका कंप्यूटर वायरस/ malware से पटने लगता है उसकी ID से ऐसे संदेश ट्विट्टर पर जाने लगते हैं जिनसे उसका कोई वास्ता नहीं होता.
 

नॉरटन एंटी वायरस बनाने वाली कंपनी सीमेंटिक्स के अनुसार फायरफॉक्स और एक्सप्लोरर दोनों ही, सुरक्षात्मक प्लग-इन उपलब्ध करवा रहे हैं लेकिन इनकी सीमा ये है कि ये केवल क्लिक किए जाने वाले URL का पूरा पता दिखाते हैं पर, इस बात का निश्चय करना उपभोक्ता पर निर्भर करता है कि वह उसे समझ कर क्लिक करे या न करे.

 
इसलिए ट्विट्टर सदस्यों की भलाई इसी में है कि वे ट्विट्टर पर किसी भी URL को क्लिक करने से पहले सुनिश्चित कर लें कि कहीं वे कोई ख़तरा तो मोल लेने नहीं जा रहे!

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-काजल कुमार

Friday, October 2, 2009

ये भी बदा है इंटरनेट के युग में

रायटर की ख़बर है कि एक दस साल की लड़की ने ई-बे वैबसाइट पर अपनी ६१ साल की नानी को नीलामी के लिए रख दिया. और उस पर ख़ूबी ये कि २७ लोगों ने बोली भी लगा दी.
 
इस बोली के लिए कोई न्यूनतम आरक्षी मूल्य नहीं रखा गया था. नानी की खूबियां गिनाते हुए कहा  गया कि ये पेंशन पर हैं, प्यार करती हैं और चाय पीना पसंद करती हैं. ई-बे ने यह विज्ञापन अपनी साइट से इसलिए हटाया क्योंकि वे मनुष्य की बिक्री के विज्ञापनों की अनुमति नहीं देती.
 
दूसरी ओर, इंग्लैंड के उच्च न्यायलय ने फ़ैसला किया है कि वह नोटिस भेजने के लिए ट्विट्टर का प्रयोग करेगा. कारण यह है कि एक छद्मनामधारी सज्जन विभिन्न राजनीतिज्ञों के विरूद्ध http://twitter.com/blaneysblarney से टिप्पणीयों देते रहते हैं. लेकिन इस व्यक्ति की वास्तविकता के बारे में पता न चलने के कारण यह निर्णय लिया गया है कि इसे नोटिस इसी के ट्विट्टर के माध्यम से भेजा जाए.

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-काजल कुमार

भारत अमरीका की तर्ज़ पर सुरक्षा उपाय कर रहा है

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अमरीका में ११ सित. के बाद कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ जिसका मुख्य कारण, वहाँ तैनात की गई सुरक्षा प्रणाली है. इस सुरक्षा प्रणाली में विस्त़ृत डेटाबेस और एक ऐसी प्रक्रिया स्थापित किए गए हैं जिनके चलते किसी भी व्यक्ति के कहीं भी होने की समुचित जानकारी उपलब्ध रहती है.

 

 

इसी तर्ज़ पर, भारत दो प्रणालियाँ Crime and Criminal Tracking Network & Systems (CCTNS) और  National Intelligence Grid (NATGRID) स्थापित करने जा रहा है. इन दोनों प्रणालियों की स्थापना से पूरे देश में सुरक्षा तंत्र की एक नई परिभाषा स्थापित होने जा रही है. CCTNS के तहत सभी पुलिस थाने आपस में जुड़ जाएँगे और पुलिस चौबीसों घंटे पूरे देश में, किसी की भी जानकारी रख पाएगी. 

इसी माह स्थापित किए जा रहे नैटग्रिड के पास विश्वस्तरीय डेटाबेस होगा जो सभी सुरक्षा एजेंसियों को उपलब्ध होगा. इस डेटाबेस को दूसरे डेटाबेसों के साथ जोड़े जाने की क्षमता होगी. नैटग्रिड में सी.बी.आई., राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, राजस्च गुप्तचर निदेशालय सरीखी गुप्तचर शाखाओं के अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी. नैटग्रिड की पहुँच देश के सभी डेटाबेसों तक होगी जिसमें बैंक, बीमा कंपनियाँ, आप्रवासन, आयकर विभाग इत्यादि शामिल हैं.

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-काजल कुमार

Monday, September 28, 2009

अब आपको खुद कुछ नहीं पढ़ना पढ़ेगा

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कई बार लगता था कि काश पढ़ने के लिए कोई और होता जो बिना किसी हील-हुज्जत के कंप्यूटर मॉनीटर से चुपचाप मेरे लिए कुछ भी पढ़ देता. मुझे कुछ भी पढ़ने के लिए आँखें गड़ाने की ज़रूरत न पड़ती.

 

हालाँकि विंडोज़ एक्स.पी. के साथ एक आदिम क़िस्म का "नैरेटर" साफ़्टवेयर आता तो है पर उसकी वैसी ही सीमाएँ हैं जिनके लिए माइक्रोसाफट विख्यात है.

 

इसी बीच छानबीन करते हुए मैंने पाया कि केवल १.३ एम.बी. के साइज़ वाला एक साफ़्टवेयर "इ-स्पीक" है जो न केवल एक ओपन सोर्स साफ़्टवेयर बल्कि अभी तक का सबसे बेहतर उत्पाद भी है जो एकदम मुफ़्त है.

 

इसकी सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसमें किसी भी वेबसाइट या पी.डी.ए फ़. सहित किसी भी फ़ाइल से कुछ भी कॉपी कर बस पेस्ट कर दीजिए, यह उसे पढ़ना शुरू कर देता है. इसकी दूसरी खूबी ये है कि जब ये आपके लिए पढ़ रहा होता है तो आप उसे .wav फ़ार्मेट में रिकार्ड भी कर सकते हैं जिसे बाद में .mp3 में बदल कर कहीं भी सुना जा सकता है, विशेषकर यह सुविधा पुस्तकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

 

इसकी जो दो सीमाएँ मुझे तुरंत समझ आईं उसमें पहली यह कि, अभी यह केवल अंग्रेज़ी भाषा ही के लिए है और दूसरी, किसी भी फ़ाइल को यह बीच में से पढ़ने की सुविधा नहीं देता है, फ़ाइल को शुरू से ही पढ़ता है यदि विराम न दिया गया हो तो. कुल मिलाकर, ओपन सोर्स और छोटा होने के कारण मैं इसे बहुत अच्छा साफ़्टवेयर मानता हूँ. आप इसे यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं.

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-काजल कुमार

Saturday, September 26, 2009

मानसिक दबाव और ई-मेल में सीधा संबंध पाया गया है !

तकनीक की तरक्की के चलते आज व्यक्तिगत समय और काम के समय में कोई अंतर नहीं रह गया है. पहले, काम से घर लौटने के बाद व्यक्तिगत समय शुरू हो जाता था और किसी को भी काम से कोई वास्ता नहीं रह जाता था. पर आज कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन के चलते, घर से भी आफ़िस का संबंध बना रहता है.

 

जहां एक ओर ‘मास मेलिंग’ भयावह रूप लेती जा रही हैं. वहीं दूसरी ओर, हर थोड़ी- थोड़ी देर में ई-मेल चैक करना एक व्यस्न का रूप लेता जा रहा है. ई-मेल चैक करना इसलिए भी और आसान हो गया है क्योंकि आज मल्टीमीडिया मोबाइल फ़ोन आम हो चले हैं. हालांकि इस बात का सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सका है पर इससे इन्कार भी नहीं किया जा रहा.

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2008 से फ्रांस टेलीकाम के 22 कर्मचारी आत्महत्याएं कर चुके हैं और अन्य 13 ने असफल प्रयास किया है. यद्यपि कंपनी ने इस बात से इन्कार किया है कि इन घटनाओं का ई-मेल से कोई संबंध है लेकिन आम जनता इस बात को मान नहीं रही है. यह बात भी महत्व रखती है कि हाल ही में फ्रांस टेलीकाम को सरकारी से निजि कंपनी में बदला गया है, इसके चलते भी कर्मचारियों में मानसिक दबाव की बात की जा रही है.

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-काजल कुमार

Monday, September 21, 2009

एक नौसेना की अनोखी मुहिम

आजकल, मेक्सिको की नौसेना, विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके समुद्री कछुए ‘गोलफीनाह’ के अंडो को सुरक्षा प्रदान कर रही है. जैसे ही हज़ारों कछुए अंडे देने के लिए मेक्सिको के ओक्साका तट पर पहुंचने लगे हैं, वहां की सरकार ने अंडों को शिकारियों से बचाने के अपने प्रयास तेज़ कर दिए हैं.

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प्रत्येक मादा कछुआ एक बार में लगभग 100 अंडे देती है. सरकार ने समुद्रतट को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है. सरंक्षण की इस मुहिम में कई जीव विज्ञानी भी जुड़े हुए हैं.

मेक्सिको के ओक्साका समुद्रतट के बाद कोस्टा रिका और भारत के समुद्रतटों का नाम आता है जहां समुद्री कछुए अंडे देते हैं. मेक्सिको में 1990 से कानूनन कछुए के मांस और अंडो की बिक्री पर प्रतिबंध है.

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-काजल कुमार

आभार:नेशनल ज्योग्राफिक  

Sunday, September 20, 2009

फ़व्वारे से नहाना घातक है

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अमरीका के कोलरैडो विश्वविद्यालय के अधीन की गई शोध में यह बात सामने आई है कि आपका फ़व्वारे के नीचे नहाना बहुत घातक हो सकता है. शोध-टीम ने न्यू यार्क, इल्लिनोयड, कोलरैडो, टेनैस्सी, उत्तरी डकोटा, शिकागो और डेन्वर शहरों में फ़व्वारों के मुहानों का परीक्षण किया जिसमें पाया कि लगभग 30% में माइकोबैक्ट्रियम पैथोजिन जीवाणु पाए गए. माइकोबैक्ट्रियम पैथोजिन जीवाणु उन लोगों को प्रभावित करते हैं जिनकी रोगरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, लेकिन ये स्वस्थ व्यक्ति को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. माइकोबैक्ट्रियम पैथोजिन फेफड़ों की बीमारियों को जन्म देते हैं.

 

फ़व्वारों के मुहानों को ब्लीचिंग घोल से साफ करने के तीन महीने बाद ये पाया गया कि इन जीवाणुओं में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो गई है. यही जीवाणु शावर के पर्दों और तरणातालों में भी पाए गए. ऐसे में भलाई इसी में है कि नहाने की आदतों में सुधार करते हुए तरणतालों और फ़व्वारों के नीचे नहाने से बचा जाए.

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-काजल कुमार

चित्र: साभार इंटरनेट

Monday, September 14, 2009

कार्टूनिंग के बारे में क्या ये जानते थे आप?

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कार्टूनिंग के इतिहास बगैहरा के बारे में तो आपने निश्चित ही कहीं न कहीं, कुछ न कुछ ज़रूर पढ़ा होगा लेकिन हो सकता है कि आपने ये न पढ़ा हो कि कोई कार्टूनिस्ट, कार्टून बनाता कैसे है. वास्तव में किसी कार्टूनिस्ट का कार्टून बनाने के बारे में बात करना ठीक वैसा ही है जैसे जादूगर का जादू के बारे में बताना. पहिये के अविष्कारक ने पहिये की जानकारी अगर बांटी न होती तो शायद हम आज भी पैदल ही चल रहे होते. आइए, आप भी कार्टून बनाइए.
कार्टून विधा के दो अंग हैं एक वैचारिक दूसरा तकनीकि. वैचारिक पक्ष के बारे में बस वही कहा जा सकता है जो प्रेमचंद ने कहा था कि कोई भी लेखक बन सकता है बशर्ते उसके पास कहने के लिए कुछ हो. विचार जितनी तेज़ी से आता है उतनी ही तेज़ी से चला भी जाता है इसलिए भलाई इसी में है कि कागज़ कलम हमेशा तैयार रखे जाएं (यह अतिश्योक्ति नहीं है).
हाथ से कार्टून बनाना सबसे आसान है. कुछ लोग पहले, आकृति की आउटलाइन पेंसिल से बनाते हैं. थोड़े मोटे पांइट वाले किसी भी पैन से कार्टून बनाए जा सकते हैं, स्याही का रंग काला अच्छा रहता है क्योंकि प्रिंटिंग के लिए यह सबसे उम्दा contrast देता है. पहले तांबे की क्राकर निब व होल्डर (पैन) का चलन था जिनके लिए दवात वाली वाटरप्रूफ़ स्याही प्रयुक्त होती थी. पेपर, आर्ट-कार्ड या आइवरी कार्ड हो तो बेहतर क्योंकि यह मोटा होता है. गल्तियां सुधारने के लिए सफेद रंग लगाया जाता है जो सूखी वाटरप्रूफ़ स्याही पर घुलता नहीं है.
पहले, शेड के लिए टोन शीट का प्रयोग होता था जो प्लास्टिक की स्टिक्कर जैसी पारदर्शी पन्नी होती थी जिस पर विभिन्न डिज़ाइन बने होते थे. इसे आवश्यकतानुसार, चित्र पर चिपका दिया जाता था. और फालतू शीट को कटर से काट कर निकाल दिया जाता था. एक ही चित्र/टाइटल इत्यादि की पुनर्वृत्ती के लिए ब्रोमाइड निकलवाए जाते थे, जो रबर सोल्यूशन से चिपका दिए जाते थे. रबर सोल्यूशन कागज़ पर गोंद/ फ़ेवीकोल की तरह चिपकता नहीं है बल्कि इसे रगड़ कर निकाला जा सकता है. पहले शब्दों को अलग से छाप कर चिपकाया जाता था जिसे पेस्टर किया करते थे, कंप्यूटरों ने यह काम भी ख़त्म कर दिया.
सबसे सुंदर कार्टून आज भी ब्रश (ब्रुश) व काली स्याही से ही बनाए जाते हैं, ब्रश की रेखाएं दबाव के अनुसार बहुत सुंदर प्रभाव देती हैं. ब्रश विधा सबसे कठिन है. ब्रश विधा में पारंगत होने का बस एक ही उपाय है और वह है बारंबार अभ्यास. कुछ लोगों को यह विधा विरासत में मिलती है जबकि बाक़ी सभी लोगों को हाथ साधने में कई-कई वर्ष लगते हैं इसलिए अधिकांश लोग ब्रश के बजाय दूसरे माध्यम अपना लेते हैं. लंबे समय से मुख्यत: जानवरों के बालों वाले ब्रश प्रयोग होते आए हैं पर आजकल सिंथेटिक्स बालों वाले भी अच्छे ब्रश मिलते हैं. कार्टून बनाने के लिए जो ब्रश प्रयोग होते हैं वे ज़ीरो नंबर से शुरू होते हैं.
तकनीक ने उन्नति की तो विदेशों से स्टैडलर, रौट्टरिंग ब्रांड जैसे महंगे पैन (pen) प्रयोग होने लगे. इनमें गाढ़ी स्याही प्रयुक्त होने के कारण इन्हें स्पीड से नहीं चलाया जा सकता. ये पैन आज भी वास्तुकला रेखाचित्रों सरीखे क्षेत्रों में प्रयुक्त होते हैं. शुरू शुरू में इनकी नकल के जब भारतीय पैन बनने लगे तो वे सस्ते तो ज़रूर थे पर बहुत घटिया हुआ करते थे. ब्रश व पैन की बहुत सेवा करनी पड़ती है क्योंकि वाटरप्रूफ़ स्याही सूख कर जम जाती है.
कंप्यूटर के आने से कार्टूनिंग क्षेत्र में बहुत परिवर्तन हुए. अब कार्टून में चरित्र और बैकग्राउंड किसी भी आम पैन से, अलग अलग बना कर 600/1200 या इससे भी अधिक DPI पर स्कैन कर लिए जाते हैं. इससे रेखाओं की मोटाई प्रर्याप्त रूप से बढ़ जाती है. बैकग्राउंड और बैकग्राउंड के चित्र बनाने में भी कंप्यूटर का काफ़ी प्रयोग होता है. बाद में इन चित्रों को आवश्यकतानुसार कंट्रास्ट घटा/बढ़ा कर आपस में व्यवस्थित कर दिया जाता है और इच्छानुसार रंग भर लिए जाते हैं. कार्टूनिंग की इस प्रकिया में अलग अलग प्रकार के साफ़्टवेयर प्रयुक्त होते हैं जो कार्टूनिस्ट की पसंद और ज़रूरत पर निर्भर है. इलस्ट्रेटर, फ़ोटोशाप, कोरल पेंट, कोरल ड्रा, पेंटर, पेज मेकर इत्यादि दसियों तरह के साफ़्टवेयर चलन में हैं. मानव चरित्र आज भी कागज़ पर हाथ से ही बनाए जाते हैं क्योंकि यह आसान है, तीव्र है और फि‍र कंप्यूटरजनित चरित्रों में वो बात नहीं ही आती.
कार्टूनिस्ट बनना तो बाएं हाथ का खेल है पर कार्टून छपवाना टेढ़ी खीर है. कार्टून प्रकाशन के बारे में पत्र-पत्रिकाओं की कोई नीति नहीं होती सिवाय इसके कि जहां तक संभव हो फ्रीलांसरों के कार्टून छापने से बचो क्योंकि कार्टून केवल विवादों को जन्म देते हैं. राजनीतिक व्यंग्यचित्रों के बारे में तो यह बात सौ फ़ीसदी लागू है. और लाला लोग यूं भी पत्र- पत्रिकाएँ विवादों के लिए नही चलाते. पत्र-पत्रिकाओं में कार्टून तभी छपते हैं जब कोई स्तंभ-संपादक मतिभ्रष्ट होने की प्रक्रिया से गुज़र रहा हो या, कहीं किसी कोने में चुटकुले या शेर लायक जगह तो बच गई हो लेकिन उतना घटिया चुटकुला या सस्ता शेर न मिल रहा हो जितना कि मालिक को समझ आता हो. कार्टून की किताब छापना तो प्रकाशकों को हास्यास्पद ही नहीं बल्कि बचकाना भी लगता है.

केवल कार्टूनिस्ट बनकर किसी पत्र-पत्रिका समूह में, कला के दम पर ही, लंबे समय तक बने रहने के लिए पर्याप्त राजनीति आना ज़रूरी होता है.
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Saturday, August 22, 2009

हवाई जहाज़ को कड़कती बिजली से कुछ क्यों नहीं होता?

क्या कभी आपने सोचा है कि जहां एक ओर हम लोग ज़मीन पर बिजली गिरने से होने वाली दुर्घटनाओं से अक्सर दो चार होते रहते हैं वहीं दूसरी ओर हवाई जहाज़ों के बारे में हम शायद ही कोई ख़बर सुनते हों जबकि वे बादलों के बीच भी उड़ते हैं. अनुमान है कि हर व्यवसायिक हवाई जहाज़ पर साल में औसतन एक बार बिजली गिरती है.

 

बादलों में अतिसूक्ष्म परिमाण या अणु (इलैक्ट्रॉन) होते हैं जिन्हें दूसरे अणु अपनी ओर आकर्षित करते हैं चाहे वे दूसरे बादलों में विद्यमान हों या ज़मीन पर. जब विभिन्न दो स्रोतों के अणु मिलते हैं तो इसे ही हम कड़कती बिजली के रूप में देखते हैं.

 

आधुनिक हवाई जहाज़ों की सुरक्षा तीन तरह से की जाती है:-

 

1. हवाई जहाज़ अल्यूमीनियम के बने होने के कारण बादलों में विद्यमान अणुओं को एक सिरे से दूसरे सिरे तक निर्बाध रूप से प्रवाहित होने देते हैं जिसके चलते यात्री सुरक्षित रहते हैं.

2. जहाज़ के पंखों पर स्थैतिकीय पलीते (static wick) लगाए जाते हैं जो जहाज़ पर एकत्र अणुओं को अपनी नोक पर एकत्र कर लेते हैं जिसके चलते बादलों के टकराने पर बिजली पूरे जहाज़ में प्रवाहित नहीं हो पाती.

3. मौसम विभाग की चेतावनी के मद्देनज़र जहाज़ को ऐसे बादलों के रास्ते में नहीं आने दिया जाता.

wingtip1 static_wick wingtip2
   

चित्र: साभार इंटरनेट

Sunday, July 26, 2009

समुद्र भी सूख सकते हैं- मिलें अराल समुद्र से

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क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र भी सूख सकते है ! यदि नहीं तो आइए आपको एक ऐसे ही एक समुद्र से मिलवया जाए जिसे अभी कल ही तक अराल समुद्र के नाम से जाना जाता था. यह आज के कज़ाकिस्तान और उज़बेकिस्तान के मध्य स्थित है, एक समय इसमें 1500 टापू हुआ करते थे. इसका क्षेत्रफल 1960 में 68,000 skm. था जो आज घट कर केवल 10% रह गया है.image और ऐसा हुआ है तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा इसे पानी उपलब्ध करवाने वाली दोनों नदियों का प्रवाह मोड़ देने से. तत्कालीन शासन द्वारा खेती के लिए पानी उपल्ब्ध करवाने की नीति के अंतर्गत इन नदियों का प्रवाह मोड़ दिया गया था.

 

आज इस मोड़े गए पानी के प्रवाह का केवल 12% भाग पक्का है शेष भाग कच्चा होने के कारण पानी का बहुत बड़ा हिस्सा वाष्पीकृत होकर नष्ट हो जाता imageहै. अराल समुद्र के सूखने के कारण जहां एक ओर पर्यावरण नष्ट हो गया है वहीं दूसरी ओर समुद्र पर जीवनयापन को निर्भर लोगों की जीवनशैली बदल गई है. यद्यपि 1994 में कज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, तुर्कमीनिस्तान, ताज़ीक़िस्तान और क्रिगीस्तान ने समाझौता  किया था कि वे अपने-अपने बजट का 1% इस समुद्र को बचाने के प्रयासों के लिए देंगे लेकिन कोई बहुत बड़ा अंतर देखने में अभी नहीं आया है. आशा करनी चाहिये कि मनुष्य इस बात को समझेगा कि दूर की न सोचने पर इस तरह के परिणाम सामने आते हैं.

चित्र-साभार वाइकीपीडिया

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Thursday, July 23, 2009

नासा (NASA) का भारत से एक संबंध ये भी है (A Quick Post)

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एक दशक पूर्व 23 जुलाई,1999 को नासा ने अंतरिक्ष में एक महत्वपूर्ण वेधशाला, कोलंबिया अंतरिक्ष यान से पृथ्वी की कक्षा में प्रतिस्थापित की जिसका नाम इसने रखा “चंद्र वेधशाला”. इसका नामकरण भारतीय मूल के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सुब्रामनियन चंद्रशेखर के नाम पर रखा गया है.

 

यह वेधशाला 5 वर्ष के कार्यकाल के लिए अंतरिक्ष में भेजी गई थी लेकिन इसने अब सफलतापू्र्वक 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं. “चंद्र वेधशाला” ने खगोलविदों को धूमकेतु, ब्लैक होल, डार्क मैटर व डार्क एनर्जी जैसे विषयों की पड़ताल में बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध करवाई हैं.

 

और अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न लिंक देखें :-

नासा

वाइकिपीडिया

 

Sunday, July 19, 2009

संभवत: गूगल क्रोम, विंडोज़ और लीनक्स को मिटा देगा …

गूगल कंपनी, साल भर में ‘गूगल क्रोम ऑपरेटिंग सिस्टम’ लाने वाली है जो संभवत: 2010 के मध्य किसी समय आएगा. ऐसी संभावनाऐं व्यक्त की जा रहीं हैं कि यह ऑपरेटिंग सिस्टम बाकी सभी प्रतियोगियों को बाज़ार से बाहर कर देगा. इससे संबंधित जो बातें सुनने में आ रही हैं उन्हें यूं समझा जा सकता है:-

 

यह ऑपरेटिंग सिस्टम ओपन सोर्स आधारित होगा यानी यह मुफ़्त तो होगा ही इसमें प्रयोक्ता जैसा चाहे वैसा बदलाव भी कर सकेगा.

इसे ज़ीरो बूट टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम कहा जा रहा है यानि कंप्यूटर स्टार्ट होने में उतना ही समय लेगा जितना समय कंप्यूटर DOS के दिनों में लिया करते थे.

यह कंप्यूटर-संसाधनों की दृष्टि से बहुत हल्का और हैंग न होने वाला imageऑपरेटिंग  सिस्टम होगा.

इसके लिए लिखे जाने वाले एप्लीकेशंस दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम पर भी चल सकेंगे जबकि आज लीनक्स के और विंडोज़ के एप्लीकेशंस एक दूसरे पर नहीं चलते हैं.

इस ऑपरेटिंग सिस्टम पर अलग से ब्राउज़र की ज़रूरत नहीं रहेगी जैसे कि आज फ़ायरफ़ाक्स, एक्सप्लोरर आदि की ज़रूरत रहती है. गूगल क्रोम ब्राउज़र इस ऑपरेटिंग सिस्टम का ही एक हिस्सा हो जाएगा, जबकि अभी यह अलग से बाज़ार में उतारा गया है.

यह ऑपरेटिंग सिस्टम इंटनेट को ध्यान में रख कर बनाया गया है.

इसे पुराने 286 से लेकर लैपटाप सहित किसी भी नवीनतम कंप्यूटर पर चलाया जा सकेगा.

इसे अलग से एंटी-वायरस और अपडेट्स की ज़रूरत नहीं होगी और न ही नए नए हा्र्डवेयर के लिए ड्राइवरज़ की, क्योंकि गूगल इस ऑपरेटिंग सिस्टम को लगातार अपडेट करने की बात कर रहा है.

 

आशा करनी चाहिए कि गूगल ने लीनक्स की लोकप्रियता न बढ़ने के कारणों से सीख ली होगी. लीनक्स मुफ़्त होने के बावजुद आजतक विंडोज़ का स्थान नहीं ले पाया जबकि शुरू-शुरू में ऐसे दावे किए गए थे. यदि गूगल इन बातों का ध्यान रख कर उन सभी विषेशताओं को समाहित कर सके जिनके बारे में जानकार कह रहे हैं तो, यह बात निश्चित है कि माइक्रोसोफ़्ट-विंडोज़ और लीनक्स के दिन अब लदने ही वाले हैं. बाक़ी …. आगे आगे देखिए होता है क्या.

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Friday, July 17, 2009

अब आप नाम नहीं, नंबर से जाने जाएंगे, तैयार हैं !

नेशनल अथॉरिटी फॉर यूनीक आइडेंटिटी (NAUI) की शुरूआत भारत में बहुत पहले हो जानी चाहिए थी. ख़ैर देर आए दुरूस्त आए. लेकिन इसके रास्ते आसान नहीं हैं क्योंकि अभी भी यह साफ़ नहीं है कि इस नंबर के अंतर्गत जो बायोमीट्रिक कार्ड जारी किया जाना है उसकी रणनीति क्या रहेगी.

 

समझा ये जा रहा है कि नंदन नीलेकणी के वर्चश्व में प्रत्येक नागरिक को दिए जाने वाले नंबर का डाटाबेस रहेगा लेकिन, कार्ड जारी करने का काम विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से राज्य सरकारों के सहयोग से होगा यद्यपि इसका कोई imageठोस खाक़ा हमारे सामने नहीं है. इसपर होने वाले खर्च, कार्यदल, कार्यदल गठन की प्रकिया, कार्यदल की समीक्षा, कार्यावधि इत्यादि को लेकर उठने वाले कई सवालों का जवाब भी अभी तक कहीं नहीं मिला है. विषेशकर इस संदर्भ में कि आजतक वोटर पहचान पत्र की प्रकिया ही पूरी तरह संपन्न नहीं हो पाई है जबकि, यह पिछले कई सालों से चल रही है.

 

 

यूनीक आइडेंटिटी नंबर दिए जाने से एक बहुत बड़ा फ़ायदा देश की अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से होगा. और वह है अवांछित राशन-कार्डों की संख्या पर नियंत्रण पाना. राशन-कार्ड पर मिलने वाली वस्तुओं और खाद्य सामग्री को सस्ता रखने के लिए सरकार हज़ारों करोड़ रूपये की सब्सिडी देती है. लेकिन डुप्लीकेट और ग़लत नामों से बने राशन-कार्डों के चलते यह पैसा अवांछित लोगों की जेब में चला जाता है. इसे रोकने में निसंदेह बहुत बड़ी मदद मिलेगी. जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग आज भी राशन कार्ड को पहचान पत्र के आशय से बनवाता है जिसके चलते भी सब्सिडी का दुरूपयोग होता आया है. आशा करनी चाहिए कि सरकार कम से कम राशन कार्ड चाहने वालों के लिए तो इसे ज़रूरी बनाएगी ही.

 

इस बीच, एक संदेह जो उत्पन्न होता है वह है इन नंबरों को जारी करने की प्रकिया में क्या वास्तव ही में इतनी सावधानी बरती जा सकेगी कि अवांछित लोगों को यह नंबर न दिये जा सकें? विषेशकर इस तथ्य को देखते हुए कि भारत आज लोगों के ग़ैरकानूनी प्रवेश को रोक पाने में स्वयं को अक्षम पा रहा है. इन सवालों का जवाब भी कहीं नहीं मिल रहा है कि इस नंबर वाला कार्ड किन परिस्थितियों में अनिवार्य होगा. और यदि यह सबके लिए अनिवार्य नहीं होगा तो क्या इसका कोई समुचित औचित्य शेष बचता है ? क्योंकि ऐसे में यह तय है कि देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसे नहीं ही बनवाएगा. तो फिर क्या ये गाल बजाने जैसी ही बात नहीं हुई ?

 

अलबत्ता अब लोग, 46461247 यादव, 7545465 शर्मा, 44654654 वर्मा, 58211768 सक्सेना जैसे नामों से जाने जाएंगे. भले ही कुछ महानुभाव अभी भी राय बहादुर 753467 सिंह ठाकुर जैसे नामों का मोह नहीं ही छोड़ पाएंगे. दक्षिण भारत में बच्चे के नाम से पहले उसके पिता और दादा का नाम जोड़ने का भी चलन है, ज़ाहिर है कि उनके नाम और लंबे होंगे लेकिन इसके चलते ऐसे बच्चों की गणितीय क्षमता में और अधिक वृद्धि की आशा करनी चाहिए.  उन लोगों का न जाने क्या होगा जो बच्चों के नाम सुझाने की किताबें छाप कर ही अपनी दुकानें चलए बैठे थे. उन पंडित जी का भी भला नहीं होगा जो बच्चों के नामकरण समारोहों में जीमने जाते थे.

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Tuesday, July 7, 2009

हिंदी में टिप्पणी करने का सबसे आसान तरीका

कुछ समय पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी गूगल ने तो आज हिंदी वालों की लॉटरी ही खोल दी. जिसमें मैंने हिंदी में टिप्पणी करने के लिए गूगल की translitation सुविधा का उल्लेख किया था.

 

मैंने पाया कि ब्लाग पर टिप्पणियां देने के लिए 3 तरह के प्रावधान हैं. पहले वे ब्लाग हैं जिनपर टिप्पणी के लिए पोस्ट के नीचे ही बाक्स बना रहता है जिसे embed box कहते हैं. दूसरे, टिप्पणी के लिए एक बाक्स pop up होता है, यानि पोस्ट के अतिरिक्त एक अन्य बाक्स खुलता है. और तीसरे, प्रावधान के अंतर्गत पोस्ट से अगला पृष्ठ टिप्पणी के लिए खुलता है.

 

जहां तक अंतिम प्रावधान की बात है, गूगल ने तो आज हिंदी वालों की लॉटरी ही खोल दी. नामक पोस्ट में दी गई जानकारी मान्य है किन्तु, पहली दो स्थितियों में वह

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में वह तरीक़ा काम नहीं आता. इसी के मद्देनज़र, ‘हिंदी कैफ़े टाइपिंग टूल’ एक बहुत बढ़िया Gadget है. इसे आप http://www.cafehindi.com/ के लिंक http://cafehindi.com/download/utt/utt.zip से डाउनलोड कर सकते हैं.

 

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इसे install करने के बाद, जब आप इसे activate कर देंगे तो आप पायेंगे कि आपके कंप्यूटर का default font हिन्दी हो गया है. बस अब आप सीधे उपरोक्त पहले तरह के दोनों टिप्पणी बाक्स में भी हिंदी में टाइप कर सकते हैं. इसके

अतिरिक्त आप आफलाइन रह कर माइक्रोसोफ्ट वर्ड में भी हिन्दी में टाइप कर अपने दस्तावेज सहेज सकते हैं. करना बस आपको इतना भर है कि माइक्रोसोफ्ट वर्ड में टाइप करते समय हिन्दी फांट akshar unicode चुनना होगा. अक्षर यूनिकोड फांट में टाइप किए गए दस्तावेज़ कापी कर इन्टरनेट/ ब्लाग पर प्रकाशित करने के लिए सीधे पेस्ट किए जा सकते हैं. मसलन, ये पोस्ट मैंने हिंदी कैफ़े टाइपिंग टूल का प्रयोग करते हुए, माइक्रोसोफ्ट वर्ड में ही टाइप की है.

 

यद्यपि, अभी स्वरों पर मात्रा लगाने में आपको कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. इस समस्या के हल के लिए निसंदेह मैं गूगल translitation की सहायता लेता हूं. इसी तरह, कुछ व्यंजनों में मात्रा आपकी मर्जी अनुसार न लगे तो शब्द विषेश को तोड़कर टाइप किया जा सकता है. और, सबसे महत्वपूर्ण बात, आप जब चाहें फांट हिंदी से अंग्रेज़ी या, अंग्रेज़ी से हिंदी कर सकते हैं – करना बस इतना है कि कीबोर्ड पर F12 कुंजी को दबाएं या, नीचे टूलबार पर हिंदी कैफ़े टाइपिंग टूल के icon को क्लिक करें.          

Sunday, July 5, 2009

99% नंबर, कभी आए हैं आपके ?

न न न मैंने तो कभी नहीं पाए. बल्कि सच्चाई तो ये है कि अपने समय में, गणित के अतिरिक्त, इस तरह के अंक कभी किसी को मिल भी सकते हैं, सुनना तो दूर, सोचा भी नहीं जा सकता था. आज मध्यवर्गी शहरी मां-बाप और बच्चे, दोनों ही 99% के फेर में सलीब पर टंगे नज़र आते है.

 

इतने प्रतिशत अंक बटोरने के पीछे मानसकिता क्या है ? जब भी इस सवाल का उत्तर जानने का प्रयास किया तो जो एक कारण सामने आया वह था बढ़ती मांग और उपलब्धता के बीच चौड़ी होती खाई. ये मांग भले हीं चहेते कोर्स की हो या चहेते संस्थान में दाखिले की, या फिर चहेती नौकरी की. इन तीनों ही संदर्भों में, जितने लोग अपेक्षा रखते हैं उतने स्थान नहीं होते. ऐसे में, हां लाइन में सबसे आगे पहुंच जाने की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन यहां सवाल ये भी है कि ऐसे अवसर कितनों को उपलब्ध हैं. क्या अवसरों की उपलब्धता का अधिकार केवल कुछ शहरी लोगों ही के लिए है? क्या बाकी लोगों को अपनी लड़ाई हाथ पीछे बांध कर ही लड़नी होगी ? क्या देश के बाकी अधिकांश लोग भी इनते ही सुविधासंपन्न हैं कि वे भी मुकाबले की स्थिति में आ सकें? या जिसकी लाठी उसी की भैंस वाली स्थिति स्वीकार्य है?

 

इतने प्रतिशत अंक क्या वास्तव में ही ज्ञानवान होने की गारंटी है ? एक समय, कुंजी से पढ़ना शर्म की बात मानी जाती थी. लोग छुप कर कुंजियां पढ़ते थे. आज मास्टर लोग किताब के बजाय कुंजी से ही पढ़ा मारते हैं. किसी को फ़ुर्सत नहीं ये जानने की कि किताब की ज़रूरत ही क्योंकर है. पाठ पढ़ाने के बाद सवाल पूछने का औचित्य होता है विश्लेषण व तर्क शक्ति का विकास. जबकि कुंजी का मतलब है उल्टी करने की क्षमता में महारत. 2 जमा 2 = 4 सभी कर लेते हैं. लेकिन 2 जमा 2, 4 के अलावा 3 और 5 भी कर लेना तभी आता है जब बच्चा जीवन के स्कूल से सीखता है.

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क्या इतने अंक लेकर जीवन में सफलता की गारंटी पक्की है्? इस सवाल का जवाब मुझे कभी नहीं मिला क्योंकि मैं सफलता का अर्थ कभी समझ नहीं पाया. शायद इसलिए कि, सफलता के बहुत से मतलब हो सकते हैं. बल्कि हर एक के लिए सफलता का अलग मतलब हो सकता है. एक बात तय है, इस तरह के अंक पाने की होड़ में वे लोग तो मुझे कभी नहीं मिले जो केवल ये जताना चाह रहे हों कि देखो हमारी पकड़ इन विषयों पर कितनी ज्यादा है.

 

जीवन में सफलता से अभिप्राय क्या है? क्या अंत में एक बड़ी सी नौकरी पा लेना ही सफलता का प्रयाय है? (क्योंकि अपना काम-धंधा जमा लेने की चाह रखने वालों को मैंने इस तरह के नंबर लेने की दौड़ में नहीं पाया). या नौकरी के बाद सुखी जीवन भी इसकी सीमारेखा में आता है? क्या सुखी जीवन केवल भौतिकता पर ही आधारित है, या इसके मायने इससे कहीं ज्यादा हैं ? ऐसे ही बहुत से दूसरे सवाल भी हैं जिन्हें मैं पाठको पर छोड़ता हूं.

इतने प्रतिशत अंक आखिर मिलते कैसे हैं? वास्तव में ही, मुझे नहीं पता कि इतने अधिक अंक आखिर मिलते कैसे हैं. लेकिन ये तय है कि इतने प्रतिशत अंक लाने के लिए बग्घी के घोड़े की तरह केवल सामने दिखाने वाला चमड़े का चश्मा बहुत ज़रूरी है. ये बात दीगर है कि जीवन के बाकी सभी ज़रूरी पाठ भले ही इस चश्मे की पहुंच से बाहर रह जाएँ. समाजशास्त्र के विज्ञाताओं के लिए यह महत्वपूर्ण विषय हो सकता है कि ऐसे लोग समाज को किस दिशा में ले जाएँगे.

 

इस मानसिकता से छुटकारा दिलाने की चाभी किसके पास है ? क्या बस 10वीं की परीक्षा को साधारण परीक्षा में बदल देना भर समाधान है? नहीं, 12वीं की परीक्षा के बारे में सरकारों की ओर से कुछ नहीं कहा जा  रहा. स्नातक/ स्नातकोत्तर परीक्षाओं में इस तरह की दौड़ क्यों दिखाई नहीं देती. इस मानसिकता से छुटकारा दिलाने का एक ही तरीका है और वह है, प्रवेश-परीक्षाएं. इस पद्ध्ति में moderation के ज़रिये लोगों को चुने जाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि केवल उन्हीं को फ़ायदा न हो जो किसी खास विषय में महारत रखते हैं.

Wednesday, June 24, 2009

अपना डोमेन नेम ? न रे बाबा न…

अपना डोमेन नेम खरीदने के पक्ष में मैंने बहुत से कारण पढ़े. लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण कारण मुझे समझ आया है, वह है काफी छोटा वेब-पता रखने की इच्छा. सवाल ये है कि बस इतनी सी बात के लिए आखिर अपना डोमेन नेम क्यों खरीदा जाए. मसलन मेरे ब्लाग का पूरा पता है - http://kajalkumarcartoons.blogspot.com जबकि ब्राउज़र में मात्र kajal.tk लिखने भर से भी मेरे ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है. ऐसे में, पहले तो पैसे देकर अपना डोमेन नेम खरीदना और फिर हर साल उसे रिन्यू करवाते रहने का टन्टा…(?) आखिर ये पाला ही क्यों जाए. यह तो मुझे यूं लगता है मानो दूध-अख़बार-भाजी-प्रेस वाले की तरह एक डोमेन-नेम वाला भी बांध लिया.

कई साल पहले, शुरू-शुरू में जब केवल geocities और googlepages जैसी साइटस ने मुफ्त वेबपेज बनाने की सुविधा देनी शुरू की थी तो मैंने कार्टून पोस्ट करने के लिए वेबपेज http://kajalkumarcartoons.googlepages.com/ बनाया था, जिसे मैंने कुछ समय बाद रिडायरेक्शनल सेवा dot.tk का प्रयोग कर kajalkumar.tk कर दिया. इसे किये भी अब कई साल होने को आए, मुझे आजतक किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा. अब ऐसे में, मेरा डोमेन नेम kajal.tk रहे या kajal.in क्या फ़र्क़ पड़ता है, कौन सी मूंछ नीची हुई जा रही है. न हींग लगी न फिटकरी और रंग भी टनाटन. यहां, http://tips-hindi.blogspot.com/2009/01/shorten-url.html (आशीष खण्डेलवाल) पोस्ट देख सकते हैं जिसमें इस सुविधा को विस्तार से बताया गया है.

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि जहां डोमेन नेम खरीदने के अपने फ़ायदे हैं वहीं दूसरी ओर पब्लिक सर्वर व इसी तरह की अन्य सेवाओं की अपनी सीमाएं हैं. मेरा मानना है कि यदि आपका काम बिना अपना डोमेन नेम खरीदे चल रहा है तो अपना डोमेन नेम क्यों ? और जहां तक बात ब्लागिंग की है, ज्यादातर नियमित पाठक फ़ीड से पढ़ते हैं और फ़ीड के माध्यम से पढ़ने का चलन बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे में आपके ब्लाग-पते का महत्व ही समाप्त हो जाता है क्योंकि एक बार फ़ीड, रीडर में जुड़ गई तो इसका काम ख़त्म, फिर फ़ीड में जोड़ा जाने वाला नाम भले ही कितना ही लंबा क्यों न रहा हो.

आजकल का ये डोमेन-नेम बेच कर उससे पलने का धंधा मुझे उन दिनों की याद दिलाता है जब भारत में केवल VSNL ही इंटरनेट सर्विस प्रदाता था. उस समय वो 3000 रुपये के कनेक्शन के साथ, छटांक भर का एक इ-मेल अकांउट देता था. आज बच्चे ये सुनकर हंसते हैं कि हम लोग कुछ MB के अकांउट के लिए यूं लुटा करते थे. कुछ समय पहले तक यही डोमेन नेम कई-कई हज़ार में बिका करते थे जो आज महज़ कुछ सौ रुपयों तक पहुंच गए हैं. ये भी ध्याद देने की बात है कि डोमेन-नेम बेचने वाले franchise की नज़र इस बात पर भी होती है कि आप उसके रेगूलर ग्राहक बनने वाले हैं जो गाहे-बगाहे कुछ न कुछ कमाई कराने वाला काम लेकर उसके पास चला ही रहेगा.

डोमेन नेम खरीदना तो पहले के दिनों में शेयर ख़रीदने-बेचने जैसी प्रकिया लगता है जिसमें ये सब करना पड़ता था कि फ़ार्म लाओ, भरो, चैक भी भरो, भेजो, फिर ख़रीद/फ़रोख्त/अलाटमेंट का पीछा करो, फाइलें संभालो, बोनस और डिविडेंड का हिसाब रखो, बैंक और खाता चैक करते रहो, कंपनियों से रजिस्टर्ड चिट्ठी-प़त्री जारी रखो…एक छोटी सी जान और हज़ार लफ़डे़, कइयों की तो पूरी की पूरी बेचारी ज़िंदगी इसी में निकल जाती थी. दूसरी ओर, डोमेन नेम न खरीदना मानो ऐसा कि आपने एक ढंग के बैंक में डी-मैट अकांउट खोल लिया और चलते बने. बाकी, बैंक और कंपनियां आपस में भुगतते रहेंगे. आप तो, जब जी चाहा नेट खोला और डंडा बजा आए.

आज, आप अपना वेबपेज / ब्लाग अपनी मर्ज़ीं और अपनी सहूलियत के हिसाब से चलाना चाहते हैं क्योंकि इंटरनेट पर टेंपलेट से लेकर तरह-तरह के उपकरण / औजार / जानकारी मुफ्त उपलब्ध हैं. जब आप अपने पैरों भागने –दौड़ने में सक्षम हैं तो बैसाखियां क्यों ?

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Monday, June 22, 2009

हिन्दी ब्लाग पर Google AdSense विज्ञापन कैसे लगाएँ

गूगल, Google AdSense फिलहाल हिन्दी ब्लागों पर अपने विज्ञापन दिखाने की सुविधा नहीं देता लेकिन आप फिर भी, चाहें तो, अपने हिन्दी ब्लागों पर AdSense विज्ञापन दिखा सकते हैं. आइए पहले, ये जान लें कि Google AdSense के कम्पयूटर हिन्दी ब्लागों को पहचानते कैसे हैं.

गूगल किसी भी ब्लाग को उसमें ब्लाग निर्माता द्वारा दी गई जानकारी से ही पहचानता है. यह जानकारी ब्लाग की settings में ब्लाग बनाते समय दर्ज की जाती है. इसमें बदलाव करने के लिए अपने ब्लाग में sign in करें. sign in करने से पहले sign in के ठीक उपर की विन्डो में Language को ड्राप डाउन मीनू में से चुन कर English कर दें. अगली विंडो में भी ऐसा ही करें. फिर settings पर कि्लक करें.

Settings से Basic पर जाएँ और Enable transliteration को ड्राप डाउन मीनू में से चुन कर disable कर दें (Settings > Basic > Enable transliteration?). बदलाव को सहेज लें.

अब Settings से Formatting पर जाएँ और Language को ड्राप डाउन मीनू में से चुन कर English कर दें (Settings > Formatting > Language). इस बदलाव को भी सहेज लें.

अब आपका ब्लाग AdSense विज्ञापन अंग्रेजी में दिखाने को तैयार है. Monetize बटन दबायें और निर्देशों का पालन कर अपना एडसेंस खाता स्थापित करें. कुछ समय बाद ही एडसेंस विज्ञापन आपके ब्लाग पर दिखने लगेंगे. अपने ब्लाग के लेआउट में जाकर, आप इन्हें अपने ब्लाग के अनुसार आकार बदल कर, अपनी मनपसंद जगह पर लगा सकते हैं.

प्रारम्भ में केवल Public Service संदेश दिखाई देंगे. किन्तु, दूसरे विज्ञापन दिखाई दें इसके लिए आपको आगामी पोस्ट और पोस्ट के शीर्षकों में एक-आध अंग्रेजी शब्द डालते रहना होगा क्योंकि गूगल के कम्पयूटर केवल अंग्रेजी शब्द ढूंढ कर उनसे मिलते जुलते विज्ञापन ब्लाग पर दिखाते हैं.

सवाल AdSense विज्ञापनों से कमाई का नहीं है बल्कि सवाल ये है कि क्या हिन्दी ब्लाग पढ़ने वाले इतनी अंग्रेजी भी नहीं जानते कि गूगल के विज्ञापन पढ़ और समझ सकें ? जब तक गूगल को भारतीय बाज़ार के विस्तार की बात समझ नहीं आती, तब तक ये विज्ञापन इसी रास्ते से दिखाने होंगे.

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