Thursday, July 8, 2010

मोबाइल फ़ोन के सभी functions का उपयोग ?..न न न

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मोबाइल
फ़ोन जहां एक ओर सुविधा देते हैं वहीं दूसरी ओर झुंझलाहट व तनाव भी देते हैं. यहां मेरा अभिप्राय तरंगों के तनाव से नहीं है अपितु उस तनाव से है जिसके चलते आप अपने मोबाइल फ़ोन में दी गई उन सभी सुविधाओं का उपयोग नहीं कर पाते जो या तो मोबाइल फ़ोन विक्रेता ने आपको फ़ोन बेचते समय बताई थीं या आपने उनके बारे में मोबाइल कंपनी की वेबसाइट पर पढ़ा है या उसके मैनुअल में कुछ-कुछ बताया गया है. या कहीं और से आपको पता चल ही गया है. इसीके चलते मेरी हालत तो महज़ इतनी ही रह जाती है कि घंटी बजे तो हरा बटन दबा कर हैलो कर लो.....बात ख़त्म करनी हो तो लाल बटन दबा दो.

आपने
बहुत सी सुविधाओं के बारे में पढ़ा होगा कि आपका फ़ोन ई-मेल व इंटरनेट सुविधा-समर्थ है, इसमें 2G व 3G जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं, कि आपके फ़ोन में WAP, GPRS जैसी सुविधाएं भी हैं, आप इसमें भारतीय भाषाएं भी टाइप कर सकते हैं, इसमें बहुत सी मल्टीमीडिया सुविधाएं हैं, आप इसे डायरी की तरह भी प्रयोग कर सकते हैं इत्यादि. और तो और, नए मोबाइल फ़ोन इतने फ़ंक्शनस के साथ आ रहे हैं कि ये पहले से भी कहीं अधिक पेचीदा होते जा रहे हैं.

मोबाइल
फ़ोन की दुनिया में आपके लिए दो ही इंटरफ़ेस हैं एक, फ़ोन विक्रेता दूसरा सेवा-प्रदाता. फ़ोन विक्रेता तो बस केले-साबुन-परचून की ही तरह मोबाइल फ़ोन भी बेचता है, उसे न तो मोबाइल फ़ोन की तकनीक से कोई मतलब होता है न ही उसका इतना स्तर होता है कि वह कुछ मूलभूत functions से आगे सीखकर आपको भी कुछ बता सके क्योंकि मोबाइल फ़ोन बनाने वाली कंपनियों के यहां ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता कि वे फ़ोन विक्रेताओं को अपने विभिन्न माडलों के फ़ंक्शनस की कोई ट्रेनिंग देती हों. कनेक्शन सेवा-प्रदाता को तो बस नोट कूटने से ही फ़ुर्सत नहीं होती इसलिए उनके यहां जो लोग बिठाए जाते हैं वे या तो बिल ठीक करने की कंप्लेंट सुनते हैं या नए कनेक्शन की फ़ीस बताते हैं…बस्स.

ऐसे
में, मोबाइल फ़ोन के मालिक की हालत उस नवकिशोर की सी होती है जो यौन शिक्षा की जानकारी के लिए अपने ही हमउम्रों के यहां-वहां डोलता घूमता है. इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी या तो सिलसिलेवार नहीं मिलती या बहुत क्लिष्ट लगती है, जिन्हें आप जानते हैं वे भी आपकी ही तरह कुछ ज़्यादा नहीं जानते. दुकान वाला भी निरीह सा ही दिखता है. सर्विस प्रदाता तो वावळे गांव के पहाड़ के नीचे आए ऊंट सा बैठा दीखता है, मोबाइल फ़ोन बनाने वाली कंपनी की वेबसाइट पर या तो “हमसे संपर्क करें” जैसा कुछ होता ही नहीं या फिर आपकी ई-मेल का व्यक्तिगत उत्तर न देकर कोई दार्शनिक सा उत्तर भेज कर पूरे कांड की ही इतिश्री कर देती है वो कंपनी. ऐसे में कोई करे तो क्या करे.

मोबाइल
फ़ोन बनाने वाली बड़ी कंपनियां आमतौर से अपने सर्विस सेंटर स्थापित करती हैं. यहां दो तरह के लोग काम करते हैं एक, वे जो केवल हार्डवेयर के बारे में जानते हैं दूसरे वे जो केवल पहले वाला मोबाइल सोफ़्टवेयर फ़ार्मेट कर नया रि-इंस्टाल करना भर जानते हैं. इससे ज़्यादा ये भी कुछ नहीं जानते. ऐसे में कहीं बेहतर होगा कि मोबाइल फ़ोन निर्माता अपने सर्विस सेंटरों पर ऐसे लोगों की भी नियुक्ति करें जो पूर्णत: प्रशिक्षित हों और यदि कोई ग्राहक किन्ही फ़ंक्शनज़ की जानकारी चाहता हो तो वह भी उसे दी जाए. हो सकता है, आने वाले कल में इस बात पर भी विचार किया जाए.
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-काजल कुमार

Tuesday, July 6, 2010

कुछ समाचार तकनीक व विज्ञान की दुनिया से

अमेरिका के राष्ट्रपति ने लगभाग 10,000 करोड़ रूपये के बराबर धनराशि सौर ऊर्जा  क्षेत्र में कार्य के लिए स्वीकृत की है. इस राशि से नए बिजलीघर स्थापित किये जाएंगे. भारत में भी एक सौर ऊर्जा मंत्रालय है जिसके मंत्री श्री फ़ारूख़ अबदुल्ला हैं. क्या कभी भारत भी इस क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करेगा !
क्या आप जानते हैं कि    माइक्रोसो़फ़्ट की मंशा, बाज़ार में दो मोबाइल फ़ोन लाने की थी. इनका नाम “किन” रखा गया है. लेकिन अब इसने साफ़ किया है कि ये फ़ोन केवल अमेरिका तक ही सीमित रहेंगे. क्या माइक्रोसोफ़्ट को आत्मबोध हो गया है कि हार्डवेयर इसके बस की बात नहीं?

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बच्चों को आगे बढ़ाने की अंधी दौड़ केवल भारत के ही मध्यवर्ग में नहीं है, अमेरिकी भी इसमें पीछे नहीं हैं. लेकिन वे केवल पढ़ाई के लिए जान देने में ही विश्वास नहीं करते बल्कि उन्होंने एक नया तरीक़ा अपनाया है और वो है बच्चों की पैदाइश ही निर्धारित कर लेना. इस दिशा में, आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि अपुष्ट समाचारों के अनुसार, वहां एक शुक्राणु बैंक की स्थापना की गई है जिसमें नोबल पुरूस्कार विजेताओं के शुक्राणु रख गए हैं जिन्हें भावी माताएं अच्छे बच्चे पैदा करने के लिए प्रयोग कर रही हैं.
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-काजल कुमार

Monday, June 28, 2010

लिनक्स संबंधी सबसे बड़ी भ्रांति (3/3)

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(लिनक्स पर तीन लेखों की कड़ी में यह तीसरा व अंतिम लेख है)

 

एक भ्रांति जो आमतौर पर देखने में आती है वह ये है कि लिनक्स में लिखी फ़ाइलें विंडोज़ में नहीं खुलतीं. सबसे पहले तो यह जान लें कि जैसे विंडोज़ में नहीं बल्कि वर्डप्रोसेसर एम.एस.वर्ड या वर्डप्रो वगैहरा में फ़ाइलें लिखी जाती हैं ठीक उसी तरह लिनक्स में भी फ़ाइलें नहीं लिखी जातीं बल्कि इसमें भी विभिन्न वर्ड प्रोसेसर प्रयुक्त होते हैं. और यही वर्डप्रोसेसर फ़ाइलें लिखने व पढ़ने के लिए प्रयोग होते हैं. इसलिए फ़ाइलों का खुलना-न-खुलना वर्ड प्रोसेसर पर निर्भर करता है.

 

एक महत्वपूर्ण बात यदि समझ ली जाए तो बहुत सुविधा होगी और वह ये है कि विंडोज़ के प्रोग्राम जान-बूझकर यह विकल्प नहीं देते कि आप वे फ़ाइलें लिनक्स प्रोग्रामों में खोल सकें क्योंकि विंडोज़, clip_image004लिनक्स को अपना प्रतिद्वंदि मानता है. जबकि लिनक्स का उद्देश्य विंडोज़ को पछाड़ना है इसलिए लिनक्स के प्रोग्राम आपको विकल्प देते हैं कि आप चाहें तो .doc आदि एक्सटेंशन के साथ फ़ाइलें सेव कर विंडोज़ के प्रोग्रामों में खोल कर काम कर सकें.


 

मतलब ये कि विंडोज़ प्रोग्रामों की फ़ाइलों पर आप लिनक्स में भी काम कर सकते हैं. यानि विंडोज़ आपको भले ही अपने ही प्रोग्रामों का ग़ुलाम बना कर रखना चाहता हो, लिनक्स आपको विंडोज़ से तो आज़ादी देता ही है गर आप चाहें तो उन्हीं फ़ाइलों पर विंडोज़ वातावरण में भी काम कर सकते हैं.

 

इतना ही नहीं, भले ही विंडोज़ के एम.एस.वर्ड जैसे प्रोग्राम लिनक्स में न चलते हों पर abiword, ओपन आफ़िस जैसे प्रोग्राम लिनक्स में तो चलते ही हैं, इन्हें आप विंडोज़ में भी इन्सटाल कर सकते हैं और इनपर बनाई गई फ़ाइलें दोनों ही वातावरण में चल सकती हैं बस आपको फ़ाइल सेव करते समय फ़ार्मेट का ध्यान रखना होगा.

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Sunday, June 27, 2010

लिनक्स में वायरस/मैलवेयर क्यों दुखी नहीं करते (2/3)

image (लिनक्स पर तीन लेखों की कड़ी में यह दूसरा लेख है)

विंडोज़ में इतनी फ़ाइलें व फ़ोल्डर होते हैं कि कई बार तो मुझे लगता है कि शायद इनका पता तो अब विंडोज़ बनाने वालों को भी नहीं होगा. विंडोज़ में कुछ सिस्टम फ़ोल्डर डिफ़ाल्ट रूप से छुपे रहते हैं जिन्हें हम हिडन (hidden) के नाम से जानते हैं. विंडोज़ इन्हें बहुत महत्वपूर्ण मानता है. इन्हें डिलीट करने से विंडोज़ काम करना बंद कर सकता है या क्रैश हो सकता है. आमतौर से वायरस बनाने वाले लोग भी अपने प्रोग्राम इसी तरह के हिडन फ़ोल्डर में इंस्टाल करते हैं. इनके नाम विंडोज़ फ़ोल्डरों से मिलते जुलते हो सकते हैं. कभी-कभी तो ये अपने प्रोग्राम विंडोज़ के हिडन फ़ोल्डरों में भी इंस्टाल कर देते हैं. इन दोनों ही दशाओं में वायरस/मैलवेयर को ढूंढ पाना बहुत मुश्किल होता है.

विंडोज़ की तुलना में, लिनक्स बहुत कम फ़ोल्डर प्रयोग करता है. और इसमें हिडन फ़ाइल/फ़ोल्डरों का भी रिवाज़ नहीं है इसलिए अगर लिनक्स में आपको कभी कहीं कोई हिडन फ़ाइल/फ़ोल्डर दिखाई दे तो आंख बंद कर उसे डिलीट कर सकते हैं, लिनक्स को खांसी-जुकाम की शिकायत भी नहीं होगी.




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विंडोज़ ने अपनी एकाधिकारात्मक प्रवृत्तियों के चलते अनगिनत दुश्मन बनाए हैं जो इसके हरेक गढ़ में सेंध लगाने के बस बहाने ही ढूंढते रहते हैं जबकि दूसरी ओर लिनक्स, हैक्सर्ज़ व वायरस बनाने वालों का पसंदीदा दुश्मन कभी नहीं रहा. बल्कि सच तो यह है ये लोग लिनक्स को आगे बढ़ाने में हमेशा तत्पर रहे हैं. विश्व के एक से बढ़कर एक साफ़्टवेयर बनाने वाले रचनात्मक मस्तिष्क अपने खाली समय में लिनक्स की प्रगति के लिए योगदान देते आए हैं. और तो और, लिनक्स के सभी संस्करण नियमित रूप से अपडेट देते रहते हैं जिन्हें प्रयोक्ता मुफ़्त ही डाउनलोड भी कर सकते हैं. लिनक्स, एकाधिकारवाद के विरूद्ध, आज एक आंदोलन का नाम है. ऐसा भी नहीं है कि लिनक्स एकदम ही नि:शंक है, इसमें भी कुछ-कुछ अपवाद हैं पर आप इन्हें अपवाद ही मान कर चलें.

 

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-काजल कुमार

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