Thursday, June 9, 2011

आज मारूति की क्लास हो ही जाए !



(चित्र साभार गूगल)


भारत में कार क्रांति की शुरूआत करने वाली मारूति-सुज़ूकी कंपनी के सितारे अब ठीक नहीं हैं. जहां एक ओर इस कंपनी की सभी कारें बाज़ार में ठीक से बिक नहीं रही हैं और डीलरों के यहां स्टॉक इकट्ठा हो रहा है. वहीं दूसरी ओर ढंग से विकने बाली इकलौती कार स्विफ़्ट के कारखाने में हड़ताल के चलते उत्पादन बंद है.

मारूति की सबसे बड़ी कमज़ोरी जहां एक तरफ इसकी कारों की लुक (appearance) है वहीं दूसरी तरफ इनकी fragility है. लगता है कि मारूति का मूल मंत्र एक ही रहा है कि भारत में केवल सस्ती कारें ही बिक सकती हैं, हो सकता है कि कंपनी अपनी इस सोच में कभी सही भी रहे हो पर इतना भी क्या कि कार की कीमत घटाए रखने के लिए कार के डिजाइन तक पर दो कौड़ी तक का ख़र्चा बचा लिया जाए और सुरक्षा भगवान या इंश्योरेंस कंपनी के भरोसे छोड़ दी जाए. समय बदल गया है. मारूति आज भी वही सोच साल रही है. और कुछ नहीं तो कम से कम, नैनो का हश्र तो इसे देख ही लेना चाहिये था.

व्यक्तिगत रूप से, मारूति-800 के पहले मॉडल को मैं आज भी इसका सबसे सुंदर मॉडल मानता हूं. वर्ना इसके बाकी समी मॉडल मुझे समझ नहीं आते. मसलन मारूति-800 के बाद इसके सबसे अधिक बिकने वाले मॉडल ज़ेन को इसने एक दिन बंद कर दिया और उसकी जगह एस्टीलो नाम से नई कार उतार दी. जो ज़ेन कम और नैनो अधिक दिखती है. यही हाल इसने एस्टीम के साथ किया कि एक दिन उसे भी बंद कर दिया जबकि यह भी इसके अधिक बिकने वाले मॉडल में से एक था. इसका एक और पका हुआ सा मॉडल है आल्टो, जिसे शायद उन अमीरों के लिए बनाया गया है जो ग़रीबों की क्रीमी-लेयर में आते हैं. एक दूसरी डिबिया बनाई इसने ओमनी नाम की, जिसे शायद उन लाला टाइप लोगों के लिए बनाया गया होगा जो बस/टैंपो का काम कार जैसी किसी चीज़ से ले लेना चाहते रहे हों. उसे भी कुछ ठोक पीट कर आजकल नया नाम दे दिया है ‘ईको’. वाह.

एक और कार है इसकी जिसे वैगन-आर कहते हैं, (हो सकता है, उमर के साथ बड़ी होकर कल यह टैम्पो-ट्रैवलर हो जाए.) पता नहीं क्या सोचकर यह मॉडल बनाया गया है मानो कार बनाकर चारों तरफ दो-दो चार-चार थापियां फेंट कर चपटा दी गई हो. धन्य हैं इस मॉडल के मालिक लोग. इसी तरह इसकी रिट्ज़ है जिसे बनाने के बाद पीछे से ठोकर अंदर कर दिया है, राम जाने क्यों. ए-स्टार बहुत बढ़िया एवरेज वाली कार बताई गई थी पर बिक नहीं रही क्योंकि लोगों को समझ नहीं आता कि इसे क्यों लिया जाए, जब दूसरी कंपनियों के ढेरों मॉडल हैं. इसी तरह एक बेहूदा सी ऊंचाई वाली कार sx-4 बनाई है, उसे ख़रीदने के ‘कारण’ भी लोग ढूंढ ही रहे हैं. स्विफ़्ट में बूट लगा कर डिज़ायर बनाई है, ठीक -ठाक बिक रही है. बलेनो इसकी एक अच्छी कार थी पर उसमें कोई ग्रेस नहीं थी, सो वह भी नहीं चली. ग्रैंड-विटारा जैसी श्रेणी में मांग उतनी नहीं है और वहां प्रतिस्पर्धा का स्तर भी अलग है.

जिप्सी एक मर्दाना सुंदर मॉडल है पर क़ीमत के हिसाब से इसके इंजन में भी वो बात नहीं है जो होनी चाहिये. हाईवे पर इसे चलाते हुए मुझे कभी ज़्यादा भरोसा नहीं हुआ इस पर.

ऐसा भी नहीं है कि इस कंपनी को कारें डिज़ाइन करनी नहीं आतीं उदाहरण के लिए ऊपर का चित्र देखें यह इसका ही किज़ाशी नाम का मॉडल है. हालांकि बाज़ार में आने वाला मॉडल इतना सेक्सी नहीं है. पर इसी तरह की बाक़ी कारें ये क्यों नहीं बनाती, आपको समझ आ गया होगा.

अब भारत में कारें यूं ही नहीं बिक जातीं, फ़ाख़्ता उड़ाने के वो दिन गए मियां. आज का ग्राहक डिज़ाइन, आफ़्टर सेल सर्विस, क़ीमत, लोन, एक्चेंज, इंजन,ससपेंशन, डेकोर, सुरक्षा इत्यादी सभी कुछ देखता है. बाक़ी, भइये मारूति कंपनी आपकी है जैसे चाहो डुबाओ हमें क्या. (अगर मारूति का कोई महानुभाव इसे पढ़े तो बुरा न माने, आत्ममंथन करे. मैं मारूति का शुभाकांक्षी हूं. मेरी पहली कार मारूति -800 थी, आज भी दो कारें मारूति की ही हैं.)
-काजल कुमार.

Sunday, May 29, 2011

अंतत: एंड्रायड हिन्दीमय हो ही गया :) हिन्दी ब्लागिंग की लाटरी

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बड़ी मुश्किल से विंडोज़ आधारित मोबाइल फ़ोन में हिन्दी की समस्या हल हुई ही थी कि बाज़ार  में एंड्रायड आधारित नए मोबाइल फ़ोन आने शुरू हो गए,  इन एंड्रायड मोबाइल ने हिन्दीभाषी ब्लागरों की दिक़्कतें फिर बढ़ा दी क्योंकि इनमें जहां एक ओर हिन्दी पढ़ने के लिए मिनी ओपेरा-5 ब्राउज़र से काम चलाना पड़ रहा था वहीं दूसरी तरफ हिन्दी में टिप्पणी करना तो संभव ही नहीं था.

पर अब वो दिन बीत गए (हालांकि लंबी-लंबी कहने में अभी काफी मेहनत है).

कुछ समय से मैं एक ऐसा मोबाइल लेने की सोच रहा था जिसमें कम से कम ये ख़ूबियों तो हों ही जैसे:- कम से कम 4 इंच का कैपेस्टिव टचस्क्रीन, WiFi व 3G, कम से कम 5MP कैमरा, उसमें एंड्रायड का नवीनतम संस्करण हो, कम से कम 16MB कार्ड की सुविधा हो, 1 GB का प्रोसेसर हो, 512 MB रैम व इतनी ही रोम, 512 MB internal memory, स्मार्ट-स्लीक व किसी अच्छे ब्रांड का हो, जिसपर हिन्दी साइट व हिन्दी मेल तो पढ़ ही सकूं….

मुझे
सोनी-एरिक्सन के एक्सपीरिया-आर्क में ये सभी ख़ूबियां तो मिली हीं, साथ ही कुछ चीज़ें तो मेरी आशा से भी अधिक मिलीं.  इसमें अंड्रायड का 2.3.2 संस्करण है. इसमें हिन्दी पढ़ने के लिए मिनी ओपेरा-5 ब्राउज़र की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसके अपने डिफ़ाल्ट ब्राउज़र में हिन्दी की सभी साइट बिना किसी हील-हुज्जत के आराम से पढ़ी जा सकती हैं लेकिन हिन्दी में टिप्पणी करना अभी भी  दूर की कौड़ी लगी क्योंकि इसमें अंग्रेज़ी के अलावा चाइनीज़ व जापानी कीबोर्ड की सुविधा तो है पर हिन्दी कीबोर्ड अभी भी नहीं है. 

हालांकि, यदि आप हिन्दी माध्यम चुनें तो सबकुछ अंग्रेज़ी के बजाय  हिन्दी में पढ़ा जा सकता है. कीबोर्ड से गूगल में raja लिखें तो यह हिंदी में ‘राजा’ शब्द वाले वाक्यों के विकल्प उपलब्ध करवा कर हिन्दी साइटें ढूंढ देता है.

हिन्दी में टिप्पणी करने के लिए इ-पंडित ब्लाग के
श्रीश बेंजवाल शर्मा का टचनागरी साफ़्टवेयर तो बस छा ही गया.
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ऊपर बाएं चित्र में एक्सपीरिया-आर्क पर टचनागरी का प्रयोग देखा जा सकता है. उसके वाद बस कापी कर टिप्पणी बाक्स में पेस्ट (यह रहा सबूत, दायां चित्र ) किया तो काम हो गया. भाई श्रीश जी का अनन्य आभार.

बस यदि यह कीबोर्ड कुछ और यूं निम्नत: व्यवस्थित कर दें कि इसे प्रयोग करते हुए स्क्रीन बार-बार ऊपर-नीचे या दाएं-बाएं न करना पड़े तो बस बल्ले-बल्ले ही हो गई समझो :)
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(पोस्ट स्क्रिप्ट -31.5.2011)

यदि गूगल ट्रांस्लिट्रेशन या क्विलपैड जैसी साइट खोलें तो वर्चुअल कीबोर्ड एक्टीवेट नहीं होता है. लेकिन मैंने पाया कि अनूप शुक्ल जी की साइट पर पोस्ट के नीचे टिप्पणी बाक्स में टिप्पणी करने से पहले यदि " Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)" सक्षम कर दिया जाए तो वर्चुअल कीबोर्ड अपने आप ही एक्टीवेट हो जाता है और आप, 'भारत' लिखने के लिए 'bhaarat' टाइप कर हिन्दी में कनवर्ट करवा सकते हैं. इसके बाद इसे कापी कर पेस्ट करना भर बचता है.

(पोस्ट स्क्रिप्ट -1.6.2011)
एंड्रायड मार्केट से "MultiLing keyboard"  डाउनलोड किया तो रही-सही क़सर भी पूरी हो गई. यह कीबोर्ड हिन्दी कीबोर्ड है. इसे इंस्टाल कर, किसी भी ब्लाग के टिप्पणी बाक्स में सीधे ही हिन्दी में टाइप किया जा सकता है. कापी पेस्ट की भी ज़रूरत जाती रही.

आज मैं पूरी तरह से कह सकता हूं कि  हां एंड्रायड अब पूरी तरह हिन्दी स्पोर्ट कर रहा है. हुर्रे :-))


-काजल कुमार

Wednesday, February 16, 2011

एंड्रॉयड में हिन्दी यूं पढ़ी जा सकती है -काजल कुमार


कुछ समय पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी आप ब्लागर हैं ! तो यह जानकारी आपको भी होनी ही चाहिये. .    इसमें मैंने यह भी लिखा था कि एंड्रॉयड चलित सभी टैबलेट/फ़ोन में हिन्दी नहीं पढ़ी जा सकती.


इस बीच इंटरनेट पर खोजबीन करते-करते मैं एक ऐसे फ़ोरम  पर पहुंचा जहां मेरी यह समस्या भी दूर हो गई. aninda1989 आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.
हिन्दी पढ़ने की विधी यह है:-
1- एंड्रॉयड चलित किसी भी फ़ोन या टैबलेट पर सबसे पहले 'ओपेरा मिनी' का संस्करण 5 डाउनलोड करें. एंड्रॉयड मार्केट पर यह मुफ़्त उपलब्ध है. अन्यथा ओपेरा की अधिकृत साइट यह है.
2-उसके बाद, ओपेरा की ऐड्रैस बार पर जाएं व opera:config टाइप करें. ध्यान रखें कि इन दो शब्दों के बीच में दो बिंदु हैं जिन्हें colon (:) कहते हैं, व कोई स्पेस नहीं है. इन शब्दों के अलावा www या http:// इत्यादि कुछ नहीं होना चाहिए.
3. इसके बाद जो मीनू आएगा उसके अंत में " use bitmap fonts for complex scripts " वाक्य होगा जिसके सामने No लिखा होगा. इसे आप Yes से बदल दें.
4. Save करें.


अब आप कोई भी ​हिन्दी साइट खोलिये और देखिये आपका मोबाइल/टैबलेट चौकोर डिब्बियों की जगह हिन्दी शब्द दिखाने लगा.... हुर्रा. छा गए आप. अपने टैबलेट पर आज पहली बार हिन्दी के शब्दों को उभरता देख कर मुझे भी इतनी ही प्रसन्नता हुई.


अब आप हिन्दी पढ़ तो सकेंगे पर अभी भी दो सीमाएं बची हैं 1, थोड़ा धैर्य रखना होगा आपको क्योंकि हिन्दी के शब्द थोड़ा समय लेने लगेंगे, साफ दिखने से पहले. यह इसलिए होगा क्योंकि जो काम आपके मोबाइल/टैबलेट को करना था वह अब साइट के सर्वर पर हो रहा है. इसकी तुलना  आप क्लाउड कंप्यूटिंग से कर सकते हैं. 2, अभी भी आप हिन्दी में टाइप नहीं कर पाएंगे. इसके लिए आपको हिन्दी सक्षम 'एंड्रॉयड बर्चुअल कीबोर्ड' की प्रतीक्षा अभी भी करनी होगी. लेकिन ये भी क्या कम है कि अब आप हिन्दी पढ़ तो पा रहे हैं :)
-काजल कुमार

Saturday, December 18, 2010

आप ब्लागर हैं ! तो यह जानकारी आपको भी होनी ही चाहिये.


7 इंच स्क्रीन वाला टच पैड जिसे टैबलेट कहा जाता है, भारत आ पहुंचा है. ये हैं सैमसंग का Galaxy Touch Pad व
Olive कंपनी का OlivePad. इनके अतिरिक्त बीनाटोन व एक अन्य कंपनी का टेबलेट भी भारत में उपलब्ध होने की ख़बर है पर इनकी वास्तविक जानकारी किसी को नहीं है. 7 इंच वाले टेबलेट अभी नई चीज़ है बाज़ार में.

टैबलेट को बाजार में प्रसिद्ध करने का श्रेय नि:संदेह iPad को जाता है जो 11 इंच स्क्रीन का है लेकिन इसमें कई फ़ीचर नहीं हैं जो 7 इंच के टेवलेट में हैं. iPad की कमियां जग-जाहिर हो चुकी हैं.

सैमसंग व ओलिव पैड के 7 इंची इन टेबलेट की खूबियां ये हैं:-
0- इनमें चार चीज़ें एक साथ समाहित हैं जो हैं - 3MP कैमरा (स्टिल व मूवी दोनों), वाई-फ़ाई इंटरनेट, ई-बुक रीडर, व 3G फ़ोन. अगर आप आमतौर से यात्रा करते हैं तो यह आपके लिए वरदान है क्योंकि आप डायरी के साइज़ वाले इस एक ही गैजेट  में ये चार चीज़ें एकसाथ ले जा सकते हैं.
0- इसके अलावा एक, कम पिक्सेल वाला कैमरा सामने की ओर अलग से है जो इंटरनैट चैटिंग या वीडयो वार्ता के लिए प्रयोग किया जा सकता है.
0- ये एंड्रोयड के 2.2 संस्करण पर चलते हैं इसलिए आप लीनिक्स की ही तरह हज़ारों साफ़्टवेयर मुफ़्            त में डाउनलोड कर सकते हैं.
0- इनकी इंटरनेट कनेक्टीविटी आम डैस्कटाप या लैपटाप जैसी ही अच्छी है.
0- ये iPad या Kindle की तरह locked device नहीं हैं. इन घोड़ों की लगाम एकदम आपके हाथ रहती है.
0- इनमें दो पिद्दे से स्टीरियो स्पीकर तो हैं ही, आप हैडफ़ोन या ब्लूटूथ से भी आवाज़ सुन सकते हैं/  बात कर सकते हैं.
0- इनमें मोबाइल फ़ोन के बाक़ी सभी फ़ीचर हैं जो आप सोच सकते हैं जैसे रिकार्डर, प्लेयर आदि.
0- 3G कार्ड होने के कारण आप भी इसमें ब्लैकबेरी जैसे नखरे का मज़ा ले सकते हैं (ब्लैकबेरी में आपको तब-तब सूचना मिल जाती है जब-जब आपको इ-मेल आती है. मोबाइल में आप केवल इंटरनेट कनेक्ट करके ही देख सकते है कि मेल आई है लेकिन आप जितनी देर इंटरनेट से कनेक्ट रहते हैं आपका मीटर चलता रहता है. 3G में दो फंडे होते हैं पहला, आम मोबाइल की तरह का रीचार्ज, जो आपके बात करने या इंटरनेट कनेक्ट करने से पैसा घटाता है. जबकि दूसरा रीचार्ज केवल डेटा डाउनलोड के ही समय पैसा घटाता है. इसलिए जैसे ही आपके लिए इ-मेल आती है तो आपका मोबाइल 3G डेटा कनेक्शन उसी समय सूचना देता है. ब्लैकबेरी में भी, बाक़ी फ़ोनों के अलावा, यही एक अलग बात है, बस.) तो भक्तजनो ! 3G में दो तरह के रीचार्ज कूपन डलते हैं. आवाज वाला तो कई साल की वैलेडिटी का होता है पर डेटा वाला 30 दिन के लिए ही है अभी (आगे चलकर ये ऊंट भी पहाड़ के नीचे आ जाएगा, चिंता न करें). अभी स्कीम 100 रूपये से शुरू होती है.  30 दिन की समाप्ति के बाद भी आप को 3G सुविधा मिलती रहती है पर तब आपका बात करने वाला पैसा घटना शुरू हो जाता है, जिसकी दर कुछ ज़्यादा होती है. अभी भारत में MTNL – BSNL का 3G पर एकाधिकार है पर शायद जल्दी दूसरों की किस्मत खुल जाए, कौन जाने.
0- ये लैपटाप की तरह, बटन दबाते ही, स्लीप मोड में जा सकते हैं इसलिए इन्हें बार-बार आन-आफ़ करने से भी पीछा छूट जाता है.
0- एक बार चार्ज करके आप इन्हें 4-6 घंटे लगातार चला सकते हैं. स्टैंडबाई मोड में तो ये 400 घंटे से ज़्यादा चलने का दावा करते हैं.
0- इनके ई-बुक रीडर बहुत उपयोगी हैं ये पिछला पढ़ा पन्ना याद रखते हैं इसलिए अगली बार ठीक वहीं से खुलते हैं जहां आपने पढ़ना छोड़ा था. आप इसमें फांट, उनका रंग व  साइज तो खुद तय कर ही सकते हैं, बैकग्राउंड रंग भी तय कर सकते हैं.
0- इनमें 32 GB के, मोबाइल में डलने वाले SD कार्ड अलग से डाले जा सकते हैं (मेरे ख़्याल से भले आदमियों के लिए अभी इतनी मेमोरी काफी है, इतनी ही अधिकतम मेमारी iPad में आती है लेकिन उसे आप सेट से बाहर निकाल नहीं सकते)
0- इनमें आप माइक्रोसोफ़्ट व पी डी एफ़ दस्तावेज पढ़ सकते हैं. doc, excel व powerpoint में तो आप इनमें लिख भी सकते हैं.
0- इनके स्क्रीन पर आने वाले की-बोर्ड बहुत सुविधा जनक हैं, आप आराम से टाइप कर सकते हैं.
0- आप इन्हें सीधे ही, आम कंप्यूटर से USB ड्राइव की ही तरह कनेक्ट कर इनके SD कार्ड पर/ से कट-कापी-पेस्ट भी कर सकते हैं.

दूसरे फ़ायदे
0 आप इन्हें किताब ही की तरह कहीं भी किसी भी करवट लेट कर पढ़ सकते हैं (जो लैपटाप व डैस्कटाप में संभव नहीं ).
0 ओलिव पैड तो यह भी बताता है कि आपने फ़लां फ़ोटो कहां व कब खींची थी, बाक़ायदा नक्शे पर. (मैं तो हैरान ही रह गया था).
0 ओलिव पैड में MapMyIndia.com का 2 GB डेटा अलग से दिया है इसलिए आप भारत में कहीं की भी यात्रा इसमें दिए नक़्शों के आधार पर कर सकते हैं. आपको गूगलमैप व इंटरनैट कनेक्टीविटी पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं बची.
0 जहां 3G कनेक्शन नहीं हो तो वहां 2G पर भी काम करते हैं ये पैड. इनका वज़न पौने चार सौ ग्राम है. शीशे की capacitive स्क्रीन हैं जो, सस्ती resistive की तुलना में कहीं अच्छी मानी जाती हैं.
0 ई-बुक पढ़ना कहीं आसान है क्योंकि इनमें फ़ोंट किताबों से भी बड़े दिखाई देते हैं.
0 इनमें पेज अपनी डायरेक्शन, टैबलेट को घुमाने के हिसाब से बदल लेते हैं इसलिए आप इन्हें आड़ा या तिरछा कैसे भी पढ़
 सकते हैं.
0 ओपेरा ब्राउज़र डाउनलोड कर लें तो यह अपनी चौड़ाई के हिसाब से बेबसाइट के शब्दों को फिट कर लेता है इसलिए आपको केवल पेज ऊपर नीचे करना होता है दाएं-बांए नहीं.
0 ये GPS सेवा से भी जोड़े जा सकते हैं.
0 इनमें और भी बहुत कुछ है जिनके बारे में मुझे ख़ुद ही पता नहीं. आए दिन नई नई चीज़ें पता लगती रहती हैं इनके बारे में.

ओलिव पैड व सैमसंग गैलेक्सी टच की तुलना

0 ओलिव पैड में flash 10-1 नहीं चलता है इसलिए इंटरनेट पर वीडियो टीवी नहीं देखा जा सकता लेकिन skyfire ब्राउज़र से यह समस्या दूर हो जाती है, बल्कि स्काइफायर तो फ्रेम भी ड्राप नहीं होने देता. सैमसंग गैलेक्सी टच में फलैश राजीखुशी चलता है. लेकिन एक जुगाड़ है जिसके चलते फ़्लैश भी इसमें चल जाता है. मैं इसका प्रयोग यूं ही कर रहा हूं. ज़्यादा जानकारी के लिए यहां देखें http://vt100hacks.blogspot.com/2011/07/flash-palyer-for-olive-pad.html?showComment=1313922518474#c5907591541994118110 यहां भी देखा जा सकता हैं http://androidcampus.blogspot.com/2011/07/app-working-adobe-flash-player-for.html
0 ओलिव पैड made in china है जिसे भारतीय कंपनी, Haier के सहयोग से बना रही है लेकिन डरें नहीं, इसकी क्वालिटी उस तरह की चाइनीज़ नहीं है जैसी कि इसकी मशहूरी है. निश्चिंत रहें, मैं इसे पिछले लगभग दो महीने से प्रयोग कर रहा हूं, यह बल्ले बल्ले प्रोडक्ट है. सैमसंग गैलेक्सी टच का अपना नाम है व विज्ञापन भी खूब आता है पर सैमसंग इसे न तो मोबाइल बताता है न टेबलेट, सैमसंग दोनों श्रेणियों के ग्राहकों को आकर्षित करने की उम्मीद में ऐसा किये बैठा है, जबकि सच यही है कि ये मोबाइल फ़ोन का स्थानापन्न नहीं ही है.
0 ओलिव पैड के प्रोसेसर की गति कम है सैमसंग गैलेक्सी टच की कुछ ज़्यादा पर ये फ़र्क़ उन्हें ही पता लगता है जिनका काम ही ये पता लगाना है. आपको  और मुझे यह फ़र्क़ पता ही नहीं चलता, इसलिए यह बेमानी है.
0 इसी तरह ओलिव पैड की  आन बोर्ड मैमोरी 512 MB है इतनी ही ये एस डी कार्ड से भी ले लेता है.  गैलेक्सी टच की 2GB है पर तब तक कोई खास फ़र्क़ तब तक नहीं पड़ता जब तक कि आप इनपर फूं-फां टाइप गेम खेलने की ज़िद न करें. मेरे ख़्याल से यह गैजैट इस तरह के खिलाड़ियों के लिए बनाया भी नहीं गया है.

सबसे बड़ी कमजोरी
0 एंड्रोयड के कारण अभी भारतीय भाषाएं, हिन्दी सहित, अभी इस पर नहीं चलती हैं. इसलिए आप हिन्दी वेबपेज नहीं पढ़ सकते.
0 इन पर किताबें पढ़ने से आंखें जल्दी थकती हैं पर हां, रोशनी पर्याप्त होने पर यह समस्या इतनी भी बड़ी नहीं लगती. यही समस्या लैप टाप पर ही यूं तो है ही.

दोनों में सबसे बड़ा अंतर
ओलिव पैड 23 हज़ार का है तो सैमसंग गैलेक्सी टच 37-38 हज़ार का. ओलिव पैड ने मुझे 16 GB का एस डी कार्ड मुफ़्त दिया तो कीमत रह गई 21.5 हज़ार. अब आप करीब 15 हज़ार रूपये यूं ही ज़्यादा ख़र्च करने के मूड में हो तो आपको सैमसंग ही लेना चाहिये वरना ओलिव पैड दा जवाब नईं. मेरे हिसाब से सैमसंग कहीं अधिक महंगा टेबलेट है जिसे ख़रीदना सझदारी के अलावा ही कुछ और कहा जाएगा. ओलिव पैड वालों की साइट ये है http://www.olivetelecom.in/ सैमसंग के बारे में कहने की ज़रूरत नहीं है.
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